कृपया धियान दी |

बहुत दिनन से पोस्ट ना कईला खातिर भूल-चूक माफ़ करीं सभे ।
राउर पसंद के हरेक कविता, कहानी आ हास्य व्यंग्य लिख रहल बानि, बाकिर तकनीकी परेशानी के चलते पोस्ट नईखे कर पावत ।
रउवाँ लो से निहोरा बा कि हमार हरेक रचना के आनंद लेवे खातिर एह वेबसाइट पर विजिट करीं-
http://www.maina.co.in

आभार ।

करुआसन

‘जियालाल! ‘
‘यस सर ‘
‘हीरालाल! ‘
‘यस सर’
‘भैयालाल!’
‘यस सर’
‘खदेङन? ‘
‘खदेङन? ‘
‘आईल बा कि ना हो?’
सगरी लईका एक सङगे बोललन सऽ,
‘जी गुरुजी आवत होई!’
अगिला दिन फेरु हम हाजिरी लगावे
लगनी
‘जियालाल!……….’
‘खदेङन!’
‘खदेङन!’
‘आईल बा कि ना हो?’
‘जी गुरुजी आवत होई!’
“ऐकर का मतलब? आज ओकरा ‘अकल के
कोल्हू’ धईल छोङाएब; आवेदऽसन।’
घिचपिचात आपन रजिस्टर पलट के कहनी।
कुछ घरि बाद ‘खदेङन’ एगो ७ बरिस के
सुघर लईका, जवना के पाकिट आधा झूलत,
नंगा पाँव, कपोर्छिल, हाथ में रबर आ नाक
में ट्रैफ़िक जाम……।
”कारे! खदेङना तु रोज-रोज काहै
लेटियातरे? तोरा ‘छछुंदर छुवले बा’ कि
‘अनबोलता काना’ भईल बाङे………।”
अनाप-शनाप बकला के बाद जब कुछ ना
बोलल तऽ हम महट्यवलि कि – ‘आछा चलऽ
जाऐ दऽ जाके पाछे बईठ जा!’
जब दूपहर भईल लईका लो खिचड़ी सरपेट के
खेलत रहे लो, तऽ हम ‘जियालाल’ से पूछनी
कि-
‘कारे! जिऊवा ई खदेङना गूँग हऽ का रे?’
‘जी गुरुजी ऊ तऽ ‘करुआसन’ हऽ!’
धराक से ऐतना कहला के बाद ऊ आपन
सरकत पेंट धईले खेले लागल। हम सोचनि
जिऊवा ‘आगे के जामल’ हऽ का? अबही
बीसो दिन ना पूजल ‘मोदी जी’ पद्मासन,
बलासन, बकासन, इहाँ तक कि मलासन, भी
कइनि हऽ ई ‘करूआसन’ का होला रे? मन
ही मन कुछ देर ‘ओझाई कईला’ के बाद जब
हमरा ‘सूखल पातो ना भेंटाइल’ तऽ मन
मार के घरे अइनि…..।
ऐतना घोचाह साहित्य तऽ हमरा मालूम
ना बाकिर अपना ‘भूसा-भंडार’ से जेतना
खाँचि उलेहे के रहे ओतना जरूर उलहनि।
बड़ी देर ले ‘आन्हार कोठी, गोटी
बीटोरला’ के बाद जब ओंघाई चपलस तऽ
फोफियात सुत गइनि।
जब सुबेर भईल तऽ हमरा ई सोची-सोच के
पाद आवे कि दरियें बुढ़िया आजी जवन कि
‘भोजपुरी में भार्गव डिक्शनरी’ से कम
नईखि, ईहाँ से १ बार पूछति तऽ कुल्ह
समस्या हल-भल हो जात। हमार आजी थोड़
कटकटाह बाकिर दिल कऽ साफ रहली|।
‘ऐ आजी! ई करूआसन का होला हो?’ हम
डेरात-डेरात पुंछन।
“मार कमासूत के! ऐकरा करूआसन के मतलबै
नईखे मालूम जाके ‘अकलेशवा’ से पूछ जेना
१० लाख रुपईया फोकट कऽ देले बारे
महटराई करे खातिर नऽ। हम तऽ पहिलही
‘कन्हैयवा’ से कहनि तोर बेटऊवा ‘आग
लगावन बा’ महटराई छोड़ि पुलिस-
पियादा के नोकरी कराव तऽ उहो
पेन्हा….।”
‘बस! बस! बस! आजी बस! ना तऽ हमार
कुल्ही पोल-चिट्ठा खोल देबू का?’
कुछ घरि मनौती कईला के बाद फेर से
पुछिए लिहनी-
‘ऐ आजी! तू तऽ जनते न बाङू हम ‘देह कऽ
सिंकुवार आ बुद्धि के मोट’ हई।’
आजी थोर घरि मयार भईलि आ कहे लगली
कि- “करूआसन मने विनाशी, अपशकुन, जेके
देखला, सुनला, संगे रहला, पऽ ऊँच-नीच,
जबुन होखे ओकरा करूआसन कहल जाला..॥
ज।इसे- अगर सुबेर-२ करूआसन ब्येकत लउक
जाव तऽ पूरा दिन हङासी लेखा बीतेला।
ऊ लो हर काम में असुभ होलन।”
‘ओकरा के ज्योतिषी काहैं ना कहल जाला?
जेकरा देखला से पता चले कि आजु कुछ
अपशकुन होए वाला बा?’, हम घचाक से
पूछनी।
‘काहैं चील्लर के चह तूरऽ तारे? ऐकरा आगे
हमरा कुछू नईखे मालूम हुंऽऽऽ…।’
हम फेर में पङ गईनि कि ‘हे प्रभु! ओह
लईका के साथे का कुछ अपशकुन भईल? जे
अभी काँचे उमिर में ऐतना जहर घोंटे के
परऽता’।
‘कोल्हू के बैल’ लेखा समय टेक आफ कइलस आ
हम सीधे प्राइमरी स्कूल में लैंड कइनि।
रोज के जइसन दैनिक-कार्यक्रम फेर जब
दूपहर भईल तऽ हम ‘हीरालाल’ के
बोलवनी।
‘कारे! तेतरहवा एह खेदरूवा के बारे में का
जानऽतारे?’
हीरा तेतरा के बोलस- ‘दी गुलू दी! पापा
तहेले ति- ओकला माई मुवल लहे दब ऊ पैदा
भईल आ तुथ दिन के बाद फेलू ओकल बाबू मू
दइले। ऐही थे ओकल ताता ओखे पंताइत भवन
में तुभागी काकी के बेच दीहले।’
‘पंताईत मने पंचायत भवन?’
‘दी गुलू दी!’
मन मसोस के रह गईल। जब पता चलल कि
पंचायत भवन केवल कोस भर के दूरी पऽ बा,
जहाँ के धुर ऐतना पावन बा। साँझ के बेरा
‘अगुताइल आ संकुचाइल’ मने ऊहाँ पहुँचनि
साफ-सुथरा आ एगो गझिन ‘नीम के गाँछ’ आ
ओकरा दहिने तरफ तुलसी कऽ चबूतरा कुल
मिलाके ‘जग खानी घर’ रहे…..। अभी हम
नियरयनि ना तबले कुछ दूरे से एगो आवाज
आइल-
‘आवऽ बेटा! तू खदेङन के महटर साब हवऽ
नऽ?’
हम एकाबैक पाछे मुङनी तऽ लगभग ७०
वर्षीय लाठी ठेंगत बुढिया माई, जेके
पथराईल आँख, ३२ भागे १६ गो दाँत
(एगो हँसमुख कऽ निशानी) आ नेह-भाव
अईसन कि करैला भी गदगद होके ‘रसदार
ऊख कप्टीशन’ में अव्वल के दावेदारी करे
लागे…।
हम हकबकात बोलनी- ‘काकी हम
तहरा…..।’
‘अरे बेटा! हम खदेङन कऽ माई, भाग कऽ
पोंछल सुभागी हई’।
‘ना काकी अईसे जनि कहऽ’
आँख लोरिया गईल।
कुछ बतकही के बाद हमरा मालूम भईल कि
सुभागी काकी के बियाह आजु से ६० बरिश
पहिले केनो गाँवे भईल रहे, उनका अदमी के
सर्पदंश से मौत होखला के बाद; उनका
सर-समाज के लो गारी, हीन आ हेय नज़र से
देखे लो। ऐही से ऊ अपना नईहर के पयान
कइली आ कुछ दिन ठेकला के बाद नईहरो के
लो ‘पिंड छोङा लिहले’। एही से काकी
आनि गाँवे मजूरी कऽ के पेट पालत रहली आ
कुछ बरिश पहिले ऐह पंचायत भवन पऽ
डेरा-डंडा डलले रहिं, आ तबे से खदेरना भी
साथे बा……। आँखि किरिये, करेजा
घेंघिया के रह गईल।
‘हाए राम!’
छि:छि: केतना दुबर-पातर आ घटिया,
समाज बा हमनि के कहाँ से विकास होई?
उधिर ‘मोदी जी’ डिजिटल-इंडिया के
आधारशिला रखत बानि आ इधिर हमनि के
बानि जा जे ओही सोच पऽ दाल दरत
बानि जा….। बाकिर हम अपना सुभागी
काकी बदे ई दू लाईन जरूर परोसब –
”धन्य बारू तू काकी धन्य बा अंचरा कोर।
अभागा खेदरुआ जेकर पोंछतारु लोर!’
‘माई के ई प्यार-दुलार कवन पैमाना
मापी?
डिजिटल-इंडिया का करि जे धईलस मन के
पापी!’

एगो मंसा (विचार)

एगो मंसा (विचार)

काल्ह ‘सिस्टर निर्मला’ के बारे में कुछ पढ़त रहनि तऽ हमरा मालूम चलल कि ऊहाँ के ‘मदर टेरेसा’ के ऊ उत्तराधिकारी रहनि हऽ फेर का हमरा ‘मदर टेरेसा’ के एगो सुक्ति ईयाद आ गईल कि-
”रोग से घृणा करो रोगी से नहीं!”
ठीक ईहै वैचारिक मत अगर आपन ‘भोजपुरी’ में शामिल कईल जाव तऽ हमरा जहाँ तक बुझाता कि हमनि के लोकगीतन में अगर गायकन पऽ टून मारल छोड़के ओह लो के गीतन पऽ धियान देवे लागल जाई तऽ कुछ सार्थक प्रयास होखि |

ई कहाँ तक सार्थक बा ?

जईसे हमरा से पूछल जाव कि ‘पवन सिंह’ के केनो जबरजस्त भक्ति गीत के नाव बताव तऽ हमार बिंदास जवाब रहित कि-
‘निमिया के डाँढ मईया लावेली झूलूहवा’ आ संडास गीत के बारे में हमार ख्याल(कुछ अईसन रहित)-

‘बतावऽ ए रसीली……..’
ई तऽ रहल दै मैटर जवना के सिद्धांत बा कि भोजपुरिया लो श्लील आ अश्लील गीत के एकही सपाट में पसंद करेला ला ना कि चोली भऽ साया के नाम पऽ|
अब दूसरका यानी गब्बर दल के सुक्ति के लथरावल जाव जेना के माने बा कि-
‘बुराई के जड़ से मिटा दो!’
यानी गायक लो पऽ बैन|

ई कहाँ तक सार्थक बा?

अगर अइसे होई तऽ शायदे-कबो आपन भोजपुरी के सम्मान बाचि अगर आँकड़ा के लेके गनना बैठावल जाव तऽ हरेक महीना लगभग ४०-५० एलबम आ रहल बा आ ऐह ‘पदाणु’ लो के कुछ जादे अउंजईली बा
नाव कमाए के|
छोड़ि ई सब आ अब आईं आपन काम के बात पऽ मने हमनि के ई प्रण लेवे के चाहि कि आज से हमनि के खाली भक्ति गीत आ
श्लील गीत पसंद करे के आ ओकरा सिवाय दोसर कुछू ना !
ना तऽ हमनि के स्थिति ओईसने होई जईसे
‘छान्ह पऽ के बिलार’ ना इधिर के ना उधिर के !

!जै हो बिछी माई!

!जै हो बिछी माई!

हजार झूठ पऽ १ बार
बीछि मारे डंक,
धरमी काम कवन कोताही
राजा चाहे रंक|

सच्चाई के आँख जनि
देखाई सरकार,
हमरे लेखा रऊवों के
ठोकी ४ बार|

देंहे-देंहे बिख भरल बा
तहरो से भी जादा,
केहू करे चपलूसी अभिषेक
केहू करे तगादा|

कैंसर के दवाई तू
इहे बात हम जानिले,
महादेव के श्रृंगार तू
सघरि जमात मानिले|

नेता नगाड़ी झूठ बोलेसन
कुछ तऽ कर उपाई,
डंक मारिके झूठ भगादऽ
जै हो बिछी माई|

नाम-गुन कऽ भेद

नाम-गुन कऽ भेद

नाम-गुन कऽ भेद में
करि तनिक विचार,
मुँह भइल बा चोखा अस
बखरा ‘लूर’ अचार |

होशिला जी मधुशाला में
डालऽस रोज पङाव,
महंगू काका पनही टांकस
गिर गईल बा भाव |

जवाहिर के ठेकऽ ता
उमिर एक सौ तीन,
राजा बाबू रोजहाई में
काटऽ तारे दिन |

रामनिहोरा सनकी-मैन
देखते खूबे गारी,
बाबा तिलोकी जी घरे
कुकूर झाँके दुआरी |

जंगबहादुर घर में सूतस
होते सांझ-अन्हार,
फकीरचंद के भट्टा चले
एक, दूई नहिं चार |

भइल मंगरुआ पैदा
शनि अमावस दिन,
फौजी बाबा फरुहा लेके
खोभऽतारे जमीन |

‘आतुर वश कुकर्मा’
संतोषवा के ढंग,
भागमनी के लोग लईका
छोङ देले बा संग |

मनभरन से ऊब गइल
पूरा गाँव-जवार,
सादा भाई के जिनगी हऽ
जईसे चित्राहार |

तेतरी काकी गूटर-गु के
धइले बाङि राग,
चिखुरी के रास न आवे,
तेलहन, बथुआ-साग |

बनवारी के उङ गईल
जिनगी के सभ पात,
पूछे मुसाफिर अभिषेक से
कहाँ बितवलऽ रात ?

बंगाली जी करऽ ओझाई
घूमलऽ ना बंगाल,
चिरागन क लगल चलिसा
जाले रोज नेपाल |

अमरजीत के खूब पदावंस
लईका सुबह-शाम,
नन्दू कऽ माई यशोदा
उनकर बाबू श्याम |

भोला का भीतर-घौंसि
मन में कलह क्लेष,
रामरुप मरजादा लांघस
सतरंगी के भेष |

भुङूक जी अपना गाँवे
करऽतारे चुङकाहि,
सती-माई क धाम पऽ
होता अब ओझाई |

रामभरोसे खेती करंस
पाँवे फटल बेवाई,
निरोगी के जान ना बांचल
केतनो भईल दवाई |

निरहू भाई भोजपुरी में करऽतारे राज,
‘अभिषेक’ अब का होई
कइसे बाची ताज ?

विश्व पर्यावरण दिवस

विश्व पर्यावरण दिवस
(५ मई)

आजु ‘विश्व पर्यावरण दिवस ‘ हs प्रकृति मानवता के ऊपर हास्यात्मक व्यंग्य कर रहल बे-

ऐ मनई तू बात ना बूझs
फेङ कटाई करेलs,
जेवन दिन दम घुटे लागी
राम नाम काहैं धरेलs ?

जियत जिनगी सथ निभाई
तबो मोह ना धरे हो,
गर-घंट मे पानी भरलs
टंगलs वर के तरे हो |

हवा-जल आ फल-फूल
कामें आई लवना के,
तू लो के सहूर ह कइसन
जइसन इजत बवना के |

कवि लो के कलम बथेला
गायक लो के गीत,
भीतरी पीङा केहू ना बूझे
केहू ‘सार आ हीत’ |

हवा छोङि हवा बिगरलs
फेंकलs फूहर धुआँ हो,
मानवता भी सूखे लागल
जइसे सूखे कुआँ हो |

हवा के बात हवा उङइल
कइलs नाहिं चेत,
हमनि के तs लाषा छोङिं
तू लो भरs खेत |

पानी हवे रंग बेरंगा
भईल बाटे बेदीन,
हितईगण पूछे ना पानी
बूझs तवना दिन |

जब-जब पानी उतरेला
तब-तब रऊवां रोईले,
हमरा कीमत मालूम करिं
जब पिछवाङा धोईले |

गिरगिट नेता रंग बनावस
दिनभर में बीस,
‘चेला-चपाटी’ माईक बजावस
हमनि बरे खीस |

अभिषेकवा त करे किसानी
यूरिया डाई डालिके,
रोग ब्याधि देंहे धरे
झंखस अपना हाल के |

“ताङी”

“ताङी”

जे पियले ऊ खेलाङी बा,
जे छुवलस ना अनाङी हो…
टप
टप
चुवेला,
अरे टप-टप चुवेला,
गरमिया में ताङी हो……
टप-टप चुवेला,
गरमिया में ताङी हो……
टप-टप चुवेलाssssss

रेड लेबल देशी ठर्रा सभे झुक जाई,
ऐकरा सुआद अभिषेक तहरा ना बुझाई!
रेड लेबल…………बुझाई!

मोहिनी के सोम रस,
लबनिया अउरी हांडी हो…

अरे टप-टप चुवेला,
गरमिया में ताङी हो……

भोरे भोरहरिया से साँझ गदबेरिया,
दिनभर आवा-जाही करेले नगरिया…
भोरे………..करेले नगरिया!

नवहन के जोर फाटे बुढवा दीही माडि हो…..

अरे टप-टप चुवेला,
गरमिया में ताङी हो……

लागे थकहरिया बदन जाले सिहरी,
गूलकोज के पावर ह ढुकाई लीहs भीतरी……
लागे थकहरि…….भीतरी!

रोग-शोक पराई जाले पहिनि के छाङि हो..

अरे टप-टप चुवेला,
गरमिया में ताङी हो……

सर-सेकराहे जदि ना करs चढाई,
७ घंटा बाद एल्कोहल बन जाई….
सर-सेकराहे……..बन जाई!

टेघरsतारे यादवजी कुश-झुट्टा-झाङी हो….

अरे टप-टप चुवेला,
गरमिया में ताङी हो……

बाटे तहरा पजरा त करs खेमटाव हो,
लोग,लईका,मेहर संगे डाली दs पङाव हो…..
बाटे तहरा……..पङाव हो!

नाहि त जिनिगिया तहार दीहि तोहै गारी हो….

अरे टप-टप चुवेला,
गरमिया में ताङी हो……